Thursday, April 9, 2026
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पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ के परस्पर सम्मान, समन्वय और सांस्कृतिक एकात्मता का अनुपम उदाहरण बना ‘सारस्वत सम्मान’ समारोह समय व्यूज गौरव प्रजापति

पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ के परस्पर सम्मान, समन्वय और सांस्कृतिक एकात्मता का अनुपम उदाहरण बना ‘सारस्वत सम्मान’ समारोह

समय व्यूज गौरव प्रजापति

कानपुर।पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ के परस्पर सम्मान, समन्वय और सांस्कृतिक एकात्मता का अनुपम उदाहरण बना ‘सारस्वत सम्मान’ समारोह 9,4,2026 दिन बृहस्पतिवार को नौबस्ता स्थित राम-राधे वाटिका में आयोजित एक गरिमामय एवं भावपूर्ण समारोह में कानपुर के प्रख्यात मराठी चतुर्वेदज्ञाता आचार्य पंडित बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन को ‘सारस्वत सम्मान’ से सम्मानित किया गया। उन्हें यह सम्मान सनातन धर्म की रक्षा, वेदों के अध्ययन-पठन-पाठन, कर्मकाण्डीय परंपरा के संरक्षण तथा भारतीय आध्यात्मिक संस्कृति के प्रचार-प्रसार में उनके अतुलनीय योगदान के लिए प्रदान किया गया।

समारोह का सबसे प्रमुख और प्रेरक भाव रहा — “पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ का परस्पर सम्मान, समन्वय और आत्मीय संगम”।
उपस्थित विद्वानों ने कहा कि यह सम्मान केवल एक विद्वान आचार्य का अभिनंदन नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परंपरा की उस विराट चेतना का उत्सव है, जिसमें ज्ञान, साधना, वेदविद्या और संस्कृति क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर एकात्म भाव में प्रतिष्ठित होती है। मराठी द्रविड़ ब्राह्मण चतुर्वेदज्ञाता आचार्य का ब्राह्मण विद्वानों द्वारा सम्मान इस बात का सजीव प्रमाण बना कि भारतीय परंपरा में विद्या का आदर, परस्पर श्रद्धा और सांस्कृतिक समन्वय ही वास्तविक शक्ति है।

भारत की सांस्कृतिक चेतना का मूल स्वर सदैव समन्वय, सहअस्तित्व और आत्मीय एकता का रहा है। यह आयोजन उसी अखंड भारतीय भावभूमि का प्रेरक उदाहरण बनकर सामने आया, जहाँ पञ्च गौड़ और पञ्च द्रविड़ की परंपराएँ परस्पर सम्मान, सद्भाव और सांस्कृतिक सौहार्द के सूत्र में एकाकार होती दिखाई दीं। इस अवसर ने यह अनुभव पुनः जीवंत कर दिया कि भारतीय सभ्यता की महानता उसकी विविध परंपराओं के परस्पर सम्मान, वैचारिक उदारता और आध्यात्मिक एकात्मता में निहित है।

विद्वानों ने कहा कि आचार्य पं. बलवंत भाऊ शास्त्री पटवर्धन जैसे मनीषी केवल कर्मकाण्ड के आचार्य नहीं, बल्कि वैदिक परंपरा के सजीव प्रतिनिधि हैं। उन्होंने अपने जीवन को वेदाध्ययन, शास्त्रचर्चा, संस्कार, साधना और धर्मप्रचार के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन यह सिखाता है कि सनातन परंपरा का वास्तविक स्वरूप वर्चस्व नहीं, बल्कि ज्ञान, विनय, सेवा और सांस्कृतिक नेतृत्व से प्रकाशित होता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य रामगोपाल मिश्रा ने की तथा संचालन आचार्य रामप्रकाश शुक्ला द्वारा किया गया। इस अवसर पर कानपुर के अनेक प्रतिष्ठित आचार्यगण एवं विद्वान उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से आचार्य श्याम जी तिवारी, आचार्य केशव, आचार्य ओमकार शास्त्री, आचार्य संजय त्रिवेदी, श्री प्रमोद, श्री रजनीकांत, श्री रामजी तिवारी, वेदव्यास शुक्ल, सोमेश केलकर, निमिष त्रिपाठी एवं विक्रम पटवर्धन ने आचार्य जी की विलक्षण विद्वता, वैदिक निष्ठा तथा गहन कर्मकाण्डीय ज्ञान की मुक्तकंठ से सराहना की।

इस अवसर पर आचार्य जी की सुपुत्री डॉ. जाह्नवी केलकर ने भी अपने उद्बोधन में उनके जीवन के विविध प्रेरक पक्षों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आचार्य जी का जीवन केवल शास्त्राध्ययन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने वेद को व्यवहार, संस्कार और समाजजीवन से जोड़ने का सतत प्रयास किया। डॉ. केलकर ने उल्लेख किया कि उन्होंने अपने पिता में एक ऐसे तपस्वी विद्वान को देखा, जिनके लिए धर्म केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि जीवन की साधना, अनुशासन और लोककल्याण का पथ था। उन्होंने कहा कि आचार्य जी ने परिवार, समाज और शिष्यों के बीच ज्ञान, विनम्रता और परंपरा के संरक्षण का जो आदर्श स्थापित किया है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए अत्यंत प्रेरणादायी है।

उपस्थित विद्वानों ने कहा कि वर्तमान समय में वेद, संस्कृत, कर्मकाण्ड और शास्त्रीय परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुँचाना अत्यंत आवश्यक है। आचार्य पं. बलवंत भाऊ शास्त्री जी जैसे विद्वान इस दिशा में समाज के लिए दीपस्तंभ हैं और उनका जीवन भारतीय सनातन परंपरा की निरंतरता का सशक्त प्रमाण है।

समारोह के अंत में उपस्थित जनों ने आचार्य जी के दीर्घ, स्वस्थ एवं सक्रिय जीवन की मंगलकामना करते हुए उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की।

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